
“जमीन मेरी, नौकरी किसी और की”—कसकेला के वृद्ध घासीराम का आरोप, वंशावली में नाम तक नहीं फिर भी मिली नौकरी, उच्च स्तरीय जांच की मांग
सूरजपुर/बिश्रामपुर:– SECL बिश्रामपुर क्षेत्र में जमीन के बदले नौकरी (Land Loser Employment) की व्यवस्था एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में आ गई है। इस बार मामला केवल जमीन के मुआवजे का नहीं, बल्कि कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी उपक्रम में नौकरी हासिल करने का है। कसकेला गांव के वृद्ध किसान घासीराम ने भैयाथान निवासी विजय पैकरा पर आरोप लगाया है कि उसकी पुश्तैनी जमीन के दस्तावेजों का कथित दुरुपयोग कर SECL में नौकरी प्राप्त कर ली गई, जबकि संबंधित परिवार की आधिकारिक वंशावली में विजय पैकरा का नाम तक दर्ज नहीं है।
घासीराम का कहना है कि जिस जमीन के आधार पर नौकरी लेने का दावा किया गया, वह भूमि आज भी राजस्व रिकॉर्ड में उसके नाम दर्ज है। इसके बावजूद कथित रूप से ऐसे दस्तावेज तैयार किए गए, जिनके आधार पर किसी अन्य व्यक्ति को रोजगार का लाभ दिला दिया गया। यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो यह केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं बल्कि सरकारी पुनर्वास नीति और दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
“जमीन हमारी, फायदा किसी और का”
पीड़ित वृद्ध का कहना है कि उसने पूरी जिंदगी अपनी पुश्तैनी जमीन की रक्षा की, लेकिन अब उसी जमीन का उपयोग कथित रूप से किसी और को नौकरी दिलाने के लिए कर लिया गया। उसका आरोप है कि वह वर्षों से अपने अधिकार के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहा है, लेकिन अब तक उसे न्याय नहीं मिला।
घासीराम का कहना है कि यदि किसी को जमीन के बदले नौकरी दी गई है, तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह व्यक्ति वास्तविक भू-स्वामी परिवार का सदस्य है या नहीं। जब संबंधित वंशावली में विजय पैकरा का नाम ही नहीं है, तो फिर नौकरी किस आधार पर और किसके प्रमाणपत्रों के सहारे मिली? यह सबसे बड़ा सवाल है।
वंशावली पर उठे सवाल
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यही है कि आरोपों के अनुसार जिस परिवार के नाम पर नौकरी ली गई, उसकी आधिकारिक वंशावली में विजय पैकरा का नाम दर्ज नहीं है। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है, तो यह संकेत देता है कि दस्तावेजों के सत्यापन में गंभीर लापरवाही हुई या फिर कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जमीन के बदले नौकरी देने की प्रक्रिया में राजस्व अभिलेख, परिवार की वंशावली, उत्तराधिकार संबंधी दस्तावेज और अन्य प्रमाणों का गहन परीक्षण किया जाता है। ऐसे में यदि किसी अपात्र व्यक्ति को लाभ मिला है, तो यह पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है।
सरपंच ने भी जताई चिंता
कसकेला ग्राम पंचायत के सरपंच ने भी पूरे मामले को बेहद गंभीर बताया है। उनका कहना है कि आरोपों की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। यदि वंशावली और भूमि अभिलेखों के विपरीत दस्तावेजों के आधार पर किसी को नौकरी मिली है, तो यह केवल घासीराम के साथ अन्याय नहीं बल्कि उन सभी वास्तविक भू-स्वामियों के साथ धोखा है, जो वर्षों से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि दोषी चाहे कोई भी हो, जांच में यदि फर्जीवाड़ा सामने आता है तो जिम्मेदार अधिकारियों और लाभ लेने वाले व्यक्ति के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
SECL की कार्यप्रणाली पर सवाल
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब SECL में जमीन के बदले नौकरी से जुड़े कई मामलों को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगते रहे हैं कि कुछ मामलों में दस्तावेजों की जांच में गंभीर अनियमितताएं हुईं, जिसके कारण वास्तविक हकदारों की जगह अन्य लोगों को लाभ मिला।
यदि घासीराम के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह स्पष्ट करेगा कि कहीं न कहीं सत्यापन प्रक्रिया में बड़ी चूक हुई या फिर कथित मिलीभगत के जरिए नियमों को दरकिनार किया गया।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
घासीराम ने पूरे मामले की स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए कहा है कि राजस्व अभिलेख, वंशावली, नौकरी से संबंधित सभी दस्तावेजों और सत्यापन प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही यदि किसी भी स्तर पर फर्जीवाड़ा या दस्तावेजों में हेराफेरी पाई जाती है तो दोषियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करते हुए गलत तरीके से मिली नौकरी को निरस्त किया जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में एक ऐसे व्यक्ति को नौकरी मिली जिसका नाम संबंधित परिवार की वंशावली में नहीं है? क्या एक वृद्ध किसान की पुश्तैनी जमीन के आधार पर किसी और ने रोजगार का लाभ उठा लिया? या फिर जांच में आरोप निराधार साबित होंगे?
इन सवालों का जवाब अब निष्पक्ष जांच ही दे सकती है। फिलहाल यह मामला SECL की पुनर्वास एवं रोजगार नीति की पारदर्शिता और दस्तावेज सत्यापन प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।





