
सूरजपुर :– जिले की हर्रा टिकरा ग्राम पंचायत की निर्वाचित सरपंच सुशीला दास पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ने का गंभीर आरोप लगा है। आरोपों के चलते मामला अब न्यायालय तक पहुंच चुका है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि जिस ग्राम पंचायत का सरपंच पद अनुसूचित जनजाति (एसटी) महिला के लिए आरक्षित था, वहां सुशीला दास ने स्वयं को आदिवासी बताते हुए जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया और चुनाव जीत लिया।
ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि सरपंच सुशीला दास की वास्तविक जाति पनिका है, जो अनुसूचित जनजाति में शामिल नहीं है। उनका कहना है कि सुशीला दास के माता-पिता भी पनिका समाज से हैं, उनका विवाह भी पनिका समाज में हुआ है तथा उनके बच्चे भी उसी समाज से संबंधित हैं। ऐसे में ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि यदि उनका पूरा पारिवारिक रिकॉर्ड पनिका समाज का है तो उन्हें अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी किया गया।
पूर्व सरपंच अंबिका सिंह ने चर्चा करते हुए आरोप लगाया कि सुशीला दास के पूरे वंश वृक्ष में कोई भी सदस्य अनुसूचित जनजाति का नहीं है। उन्होंने अपने दावों के समर्थन में सेटलमेंट रिकॉर्ड, वंशावली, मतदाता पहचान पत्र, परिवार के सदस्यों की बोर्ड परीक्षाओं की अंकसूचियां तथा अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने का दावा किया है। उनका कहना है कि उपलब्ध अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि सरपंच का परिवार पनिका समाज से संबंधित है।
ग्रामवासी परबत बाई राजवाड़े सहित कई अन्य ग्रामीणों ने भी सरपंच के आदिवासी न होने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि यदि आरक्षित सीट पर गलत जानकारी के आधार पर चुनाव लड़ा गया है तो यह पूरे पंचायत क्षेत्र के मतदाताओं के साथ अन्याय है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
बताया जा रहा है कि इस मामले की शिकायत गांव के पूर्व उपसरपंचों एवं अन्य ग्रामीणों द्वारा अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) सूरजपुर, जिला प्रशासन तथा मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन तक की गई है। शिकायत के बाद मामला न्यायालय में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय आना अभी शेष है।
वहीं, सरपंच सुशीला दास ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ राजनीतिक और व्यक्तिगत द्वेष की भावना से षड्यंत्र रचा जा रहा है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग उनकी छवि खराब करने के उद्देश्य से झूठे आरोप लगा रहे हैं, जबकि इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। उन्होंने भरोसा जताया कि न्यायालय और सक्षम जांच एजेंसियों के समक्ष सत्य सामने आएगा और उन्हें न्याय मिलेगा।
अब इस पूरे मामले पर सभी की निगाहें न्यायालय और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की जांच पर टिकी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला चुनावी पात्रता और जाति प्रमाण पत्र की वैधता से जुड़ा बड़ा कानूनी विषय बन सकता है। वहीं यदि आरोप निराधार साबित होते हैं तो शिकायतकर्ताओं के दावों पर भी सवाल खड़े होंगे।
फिलहाल यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। इसलिए अंतिम निर्णय आने तक किसी भी पक्ष के आरोप या दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं मानी जा सकती।



