छत्तीसगढ़सूरजपुर

पुश्तैनी आदिवासी जमीन पर दलालों की साजिश, हंगामा होने पर तहसीलदार लौटे खाली हाथ

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सूरजपुर :– जिले के भटगांव तहसील के धरमपुर गांव में पुश्तैनी जमीन को लेकर आदिवासी ग्रामीणों का आक्रोश जल्द ही सड़कों पर उतरने के आसार निर्मित हों रहा है, इसके पीछे मूल कारण मंगलवार 18 नवंबर को तहसीलदार शिव नारायण राठिया के नेतृत्व में धारा 250 के तहत राजस्व अमला जब भूमि कब्जा दिलाने पहुंचेे तो बड़ी संख्या में नाराज ग्रामीणों ने नारेबाजी शुरू कर दी। हंगामे के बीच अधिकारी किसी तरह खाली हाथ लौट गए। यह घटना न केवल राजस्व विभाग की लापरवाही का आईना है, बल्कि जमीन दलालों की चालबाजी का काला कारनामा भी उजागर कर रही है।

1972 से चली आ रही पट्टे की जंग: दलालों ने दस्तावेजों में की जालसाजी?..

ग्रामीणों के मुताबिक, 1972-73 में सोमारू आत्मज रनसाय (जाति कवर, आदिवासी) को सिंहदेव योजना के तहत जमीन का पट्टा मिला था। 1977-78 के राजस्व अभिलेखों में उनका नाम दर्ज है, जो 1991-92 तक रिकॉर्ड में बरकरार रहा। लेकिन 1994 के बंदोबस्त के दौरान गड़बड़ी हो गई। सुधार के लिए विभाग में दिए आवेदन दशकों से धूल फांक रहे हैं। इसी फेरे में चालाकी से दस्तावेजों में हेरफेर कर किसी और के नाम रजिस्ट्री करवा ली। इसके बाद 2021 में इस भूमि को श्रीपति विश्वास को बेच दिया गया। दूसरी ओर, ग्रामीण लगातार जिला प्रशासन के दरवाजे कचोटते रहे। राजस्व निरीक्षक की जांच में पूरी स्थिति को त्रुटिपूर्ण बताते हुए पंचनामा ग्रामीणों की मौजूदगी में तैयार किया गया। इसकी सत्यापित प्रति भूस्वामी ने राजस्व न्यायालय से प्राप्त कर ली है। फिर भी, दशकों से इसी मिट्टी पर पसीना बहाकर गुजारा करने वाले आदिवासियों की धरोहर लूटी जा रही है। विभाग की मिलीभगत से हमारी पुश्तैनी जमीन छीनी जा रही है, नाराज ग्रामीणों ने चेतावनी भरी आवाज में कहा।

धारा 250 के तहत अमला घिरा, तहसीलदार को लौटना पड़ा

धारा 250 के तहत कंटेदार तार और खुटा लेकर पहुंचे राजस्व अमले को ग्रामीणों ने घेर लिया। हालात बिगड़ते ही हंगामा मच गया। विवाद के बाद तहसीलदार को बैरंग वापस लौटना पड़ा। स्थानीय स्तर पर मामला अब गरमाता जा रहा है। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है, वरना आंदोलन तेज करने का ऐलान कर दिया।

भ्रष्टाचार का काला साया: प्रशासन की खामोशी पर सवाल?

राजस्व विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं। इसके बावजूद जिला प्रशासन अलर्ट मोड में आने के बजाय खामोश तमाशबीन बना हुआ है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या लाचार आदिवासियों की पुश्तैनी जमीन बचेगी, या दलालों का राज यूं ही चलता रहेगा..? यह सवाल पूरे जिले में गूंज रहा है और आदिवासी समुदाय में आक्रोश की आग भड़का रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर न्याय नहीं मिला, तो सड़कें फिर गवाह बनेंगी।

Fareed Khan

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