
सूरजपुर :– में करोड़ों रुपये की लागत से बना तथाकथित “हाइटेक” बस स्टैंड इन दिनों अपने असली उद्देश्य से भटक कर एक नए ही प्रयोग का केंद्र बन गया है। यात्रियों की सुविधा के लिए बनाया गया यह आधुनिक बस स्टैंड अब नशेड़ियों, दारूबाजों और आवारा मवेशियों का पसंदीदा अड्डा बन चुका है। सवाल यह है कि क्या यही विकास की वह तस्वीर है, जिसे दिखाकर जनता को खुश किया जाता है?
स्थानीय लोगों के मुताबिक जब से बस स्टैंड के पास शासकीय अंग्रेजी शराब दुकान खोल दी गई है, तब से इस परिसर का “उपयोग” ही बदल गया है। बस का इंतजार करने वाले यात्रियों से ज्यादा यहां बोतल लेकर बैठने वाले सज्जन दिखाई देते हैं। बसें कम और बहस-मुक्केबाज़ी के दृश्य ज्यादा देखने को मिलते हैं। कई बार तो स्थिति इतनी मनोरंजक हो जाती है कि यात्रियों को लगता है मानो वे बस स्टैंड नहीं बल्कि किसी लाइव रियलिटी शो के दर्शक बन गए हों।
यात्रियों के बैठने की कुर्सियों और प्रतीक्षालयों के आसपास शराब की खाली बोतलें, प्लास्टिक के गिलास और कांच के टुकड़े ऐसे बिखरे पड़े हैं जैसे किसी “स्वच्छता अभियान” का उल्टा संस्करण चल रहा हो। मच्छर और मक्खियां भी शायद इस नए माहौल से इतने खुश हैं कि उन्होंने इसे अपना स्थायी निवास बना लिया है। यात्रियों को बस के साथ-साथ बीमारी का इंतजार भी करना पड़ सकता है।
रही-सही कसर आवारा मवेशियों ने पूरी कर दी है। कभी गायें प्लेटफॉर्म पर टहलती दिखती हैं तो कभी कुत्ते आराम से यात्रियों की सीटों पर कब्जा जमाए रहते हैं। लगता है कि बस स्टैंड अब इंसानों से ज्यादा पशुओं और नशेड़ियों के साझा उपयोग का सार्वजनिक स्थल बन चुका है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि करोड़ों रुपये खर्च करके बनाए गए इस हाइटेक बस स्टैंड की हालत पर जिम्मेदार विभाग गहरी नींद में है। प्रशासन शायद इस प्रयोग को “सामाजिक समरसता” का नया मॉडल मान रहा है, जहां यात्री, नशेड़ी और मवेशी सभी एक ही परिसर में बराबरी से समय बिता रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन कभी जागेगा या फिर सूरजपुर का यह हाइटेक बस स्टैंड इसी तरह “नशे का स्टैंड” बनकर अपनी पहचान कायम रखेगा? फिलहाल तो यात्री यही सोच रहे हैं कि बस कब आएगी — और व्यवस्था कब सुधरेगी।





