
भाजपा की सरकार में चौथा स्तंभ पर लगातार हमला आखिर क्यों?
क्या आलोचनाएं बर्दाश्त नहीं या फिर सच्चाई से डर?
अंबिकापुर :– में हुई एक घटना ने न केवल स्थानीय प्रशासन, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सड़क पर कथित रूप से हंगामा कर रहे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गतिविधियों को जब एक पत्रकार ने अपने कैमरे में रिकॉर्ड करना शुरू किया, तो उसे पेशेवर दायित्व निभाने की कीमत सार्वजनिक रूप से मारपीट झेलकर चुकानी पड़ी।
मामले में कोतवाली थाना, अंबिकापुर में अपराध क्रमांक 0128/2026 दर्ज किया गया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं के तहत प्रकरण कायम किया है। बावजूद इसके, समाचार लिखे जाने तक किसी भी नामजद आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
क्या था घटनाक्रम?
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शहर के व्यस्त गुदड़ी चौक क्षेत्र में कुछ राजनीतिक कार्यकर्ता नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। स्थिति धीरे-धीरे तनावपूर्ण होती जा रही थी। इसी दौरान एक स्थानीय पत्रकार मौके पर पहुँचा और घटनाक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग करने लगा।
बताया जाता है कि कैमरा देखते ही कुछ कार्यकर्ता भड़क उठे। उन्होंने पत्रकार को रिकॉर्डिंग बंद करने के लिए कहा। पत्रकार द्वारा यह कहते हुए कि वह अपना पेशेवर कर्तव्य निभा रहा है, कैमरा बंद करने से इनकार करने पर उसे कथित रूप से धक्का-मुक्की और मारपीट का सामना करना पड़ा। आरोप है कि जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए जान से मारने की धमकी भी दी गई। यह सब सार्वजनिक स्थान पर, लोगों और पुलिस की मौजूदगी में हुआ।
एफआईआर में तीन व्यक्तियों को नामजद किया गया है।
प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। सार्वजनिक घटनाओं की रिकॉर्डिंग और रिपोर्टिंग पत्रकार का अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका दायित्व भी है। यदि कैमरे से असहजता और सवालों से आक्रोश उत्पन्न होता है, तो इसे पारदर्शिता के बजाय असुरक्षा का संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएँ केवल व्यक्तिगत हमले नहीं होती, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करती हैं। जब सत्ता या उसके समर्थक आलोचना से बचने के लिए आक्रामक रुख अपनाते हैं, तो इसका असर दूरगामी होता है।
गिरफ्तारी नहीं, आंदोलन की चेतावनी
मामले में गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज होने के बावजूद अब तक गिरफ्तारी नहीं होने से पत्रकार संगठनों और सामाजिक संगठनों में रोष है।
पत्रकार प्रतिनिधियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र गिरफ्तारी नहीं हुई, तो प्रदेश स्तर पर चरणबद्ध आंदोलन किया जाएगा। इसमें धरना-प्रदर्शन, ज्ञापन और व्यापक विरोध कार्यक्रम शामिल हो सकते हैं।
बड़ा सवाल?
छत्तीसगढ़ के इस आदिवासी अंचल में हुई यह घटना केवल स्थानीय विवाद नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न की याद दिलाती है—
क्या कानून सर्वोपरि है, या सत्ता की छाया में उसकी परिभाषा बदलने लगी है?
यदि सार्वजनिक स्थान पर पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की सुरक्षा का प्रश्न और भी बड़ा हो जाता है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि असहमति, सवाल और रिकॉर्डिंग से डर न हो—बल्कि उन्हें जवाबदेही के अवसर के रूप में देखा जाए। अब निगाहें प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।





