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मजदूरों की जिंदगी सस्ती, ठेकेदारों की जेब भारी: सूरजपुर गैस प्रोजेक्ट का काला सच?

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मुनाफे के लिए मौत का सौदा? विचित्र कंस्ट्रक्शन और श्रम विभाग पर गंभीर आरोप…

सूरजपुर :– हाईवे 43 किनारे चल रहा गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट अब सीधे-सीधे “लूट और लापरवाही” का पर्याय बन चुका है। Bharat Petroleum Corporation Limited (BPCL) के इस काम में निजी ठेकेदार “विचित्र कंस्ट्रक्शन” की कार्यप्रणाली ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मौके की हकीकत बता रही है कि यहां नियम-कायदों को खुलेआम कुचला जा रहा है और सरकारी पैसों की बर्बादी को जैसे मंजूरी मिली हुई है। सरकारी पाइपलाइन पर ‘बुलडोजर से अन्याय’—करोड़ों की बर्बादी       जहां पहले से पानी की पाइपलाइन डली हुई है, उसी जगह जेसीबी से दोबारा खुदाई कर पाइपों को बेरहमी से तोड़ा जा रहा है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं—यह सीधे-सीधे सरकारी संपत्ति की बर्बादी है।

हैरानी की बात यह कि जेसीबी चालक खुद कबूल कर रहा है—“ऊपर से आदेश है, पाइप टूटते हैं तो टूटने दो।” सवाल यह है कि ये “ऊपर” आखिर कौन है जो सरकारी नुकसान को खुली छूट दे रहा है?       बिना नंबर के वाहन—कानून को खुली चुनौती!  मौके पर कई गाड़ियां बिना रजिस्ट्रेशन नंबर के दौड़ती मिलीं। यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि साफ संकेत है कि कुछ बड़ा छुपाया जा रहा है। आखिर किसके संरक्षण में ये अवैध वाहन काम कर रहे हैं?

सवाल पूछो तो ‘गुस्सा’—जवाब नहीं!

जब साइट पर मौजूद सुपरवाइजर सिंपु यादव से जवाब मांगा गया, तो वे बौखला उठे। साफ है—जवाब नहीं है, इसलिए आक्रामकता दिखाई जा रही है। पारदर्शिता की जगह धमकाने की कोशिश—यही इस पूरे प्रोजेक्ट की असली तस्वीर है।

मजदूरों की जान पर ठेका—न बीमा, न सुरक्षा!      इस पूरे खेल का सबसे शर्मनाक पहलू है मजदूरों की हालत। वेल्डर, फिटर और अन्य श्रमिक बिना किसी बीमा और पर्याप्त सुरक्षा के काम करने को मजबूर हैं। अगर कोई हादसा हो जाए तो जिम्मेदार कौन?

सेफ्टी ऑफिसर ने पल्ला झाड़ लिया—“हमें नहीं पता।” प्रोजेक्ट मैनेजर प्रदीप मिश्रा से सवाल किया गया तो उन्होंने गोलमोल जवाब देकर दस्तावेज दिखाने से इनकार कर दिया। क्या छुपाया जा रहा है?

श्रम विभाग को पत्रकारों द्वारा दी गई मामले की सूचना, अधिकारी द्वारा टालमटोल जवाब! मिलीभगत की आशंका

पत्रकारों द्वारा जब इस गंभीर विषय पर श्रम विभाग के अधिकारियों से बात चीत की गई तो सभी अपना पल्ला झाड़ते नजर आए। एक अधिकारी ने तो यहां तक कह दिया कि हमें पहले से पता है कि उक्त ठेकेदार द्वारा कोई लेबर पंजीयन नहीं कराया गया है।

अब आप स्वयं सोचिए कि इसका क्या मतलब ये है, विभाग को पहले से ही सारी जानकारी होने के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं की गई और बल्कि आँखें मूंद कर बैठने में ही भलाई समझी गई।

सूरजपुर श्रम विभाग का हाल सवालों के घेरे में:–

सूरजपुर का श्रम विभाग अब शायद “कार्रवाई” शब्द को सिर्फ फाइलों में ही जिंदा रखना चाहता है। ज़मीनी हकीकत ये है कि श्रमिकों के साथ खुलेआम लापरवाही और गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाया जा रहा है, और जब पत्रकार इस सच्चाई को सामने लाते हैं, तब भी जिम्मेदारों की नींद नहीं खुलती। सवाल ये है कि अगर सबूतों के बावजूद भी कार्रवाई शून्य ही रहनी है, तो फिर ये विभाग आखिर किसके लिए है — श्रमिकों के हक के लिए या सिर्फ कुर्सियों की हिफाज़त के लिए?

पूरी कहानी चीख-चीख कर कह रही है—कुछ तो गड़बड़ है!

सरकारी पाइपलाइन तोड़ी जा रही है

बिना नंबर के वाहन खुलेआम चल रहे हैं

मजदूरों की सुरक्षा शून्य है

अधिकारी जवाब देने से भाग रहे हैं

यह महज लापरवाही ही नहीं,  मिलीभगत की आशंका

प्रशासन की चुप्पी—सवालों के घेरे में

इतनी बड़ी गड़बड़ी के बावजूद प्रशासन की चुप्पी खुद एक बड़ा सवाल है। क्या किसी बड़े संरक्षण में यह खेल चल रहा है?

अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ सरकारी पैसे की बर्बादी नहीं होगी—बल्कि किसी बड़े हादसे का इंतजार लग रहा!

सूरजपुर की जनता जवाब चाहती है। दोषियों पर सख्त कार्रवाई और पूरे प्रोजेक्ट की निष्पक्ष जांच।

Fareed Khan

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